Thursday, June 10, 2010

सच्ची सफलता..

"सफलता" जिसकी बुलंदिओं को हर कोई छूना चाहता है., जो सबके लिए आखिरी मंजिल होती है| आपको क्या लगता है?? क्या है ये सफलता?? कैसे मिलती है???

                                                                   क्या सिर्फ समाज में उच्च स्थान, बड़ा कारोबार ,  रोआब और मोटी कमाई होना ही काफी है?? चलिए मन की आज के समय में ये भी ज़रूरी है परन्तु केवल इन चीज़ों से ही ज़िन्दगी पूर्ण कही जा सकती है??
              आज  की नारी भी इस सफलता के पीछे जी जान से पड़ी हुई है| अपने आपको पुरुष के बराबर साबित करने के लिए बाहरी सफलता के पीछे भाग रही है| देखिये! 'पुरुष की बराबरी' इस शब्द में तो पहले ही हीणता छिपी हुई है| बराबरी का तो सवाल ही पैदा  नहीं होना चाहिए| भला स्त्री  पुरुष से कम ही कब थी? ईशवर ने तो दोनों को समान बनाया था | हाँ बस दोनों के काम बाँट दिए गए थे | नारी कोमलता का प्रतीक है| सौंदर्य का प्रतिरूप है| ममता की छाँव  है| सहनशीलता की उदाहरण है|  जब उसका  अपना  इतना अच्छा और  सराहनीय  स्थान है  तो पुरुष की बराबरी करने की होड़ में वो  खुद को नीचे  क्यों  करती जा रही है| 
                                                         एक बात बताइए.... जब कोई पुरुष स्त्री  जैसी    हरकतें करता है तो उसका मजाक उड़ाया  जाता  है और जब वो कोमलता प्रदर्शित करे  तो कहा जाता है की चूड़ियाँ  पहन  लो |  विपरीत  गुण  होने को समाज  कभी  स्वीकार ही नहीं करता |  फिर नारी क्यों  अपनी पहचान  को त्यागना चाहती है??
                                               मेरी माँ  गृहणी हैं |  समाज में कोई बहुत ज्यादा नाम नहीं है उनका और मोहल्ले  वाले उन्हें मेरे पापा  की पत्नी के रूप में ही जानते हैं |  शुरू से आज तक घर का काम करती आ रही हैं | रिश्ते नातों को बाखूबी निभाया  है  | अपने बच्चों की परवरिश में कोई कमी नहीं रखी  उन्होंने कभी और पापा की ढाल  बन कर साथ निभाया है उनका | मेरी नज़र में नारी  की  सच्ची  सफलता  यही है | मेरी बातों को गलत नज़रिए से मत  लीजियेगा , कहने का तात्पर्य  केवल ये है की नारी चाहे कितनी भी सफल हो जाये  पर अपना  माँ  और पत्नी होने का फ़र्ज़ जब तक वो ठीक से नहीं निभाती, वो सच्ची सफलता को प्राप्त  नहीं कर सकती |
                                     हम  सब भी इसी सफलता के पीछे दीवाने हुए पड़े  हैं|  सफल  होने के लिए   अपने  कर्तव्यों  को भूल रहे हैं | वफादारी  को भूल रहे हैं, जो सफलता का मूल हैं|    
मेरे लिए तो हर वो इंसान, चाहे अमीर हो  या गरीब, सफल है  जो अपने कर्तव्यों  की पालना तहे  दिल से  करता हो,  अपने काम, अपने रिश्तों और अपने आप के लिए वफादार  हो \
                                                       सोचिये ! यदि हर इंसान अपनी सच्ची सफलता खुद अपने आप तलाशने की कोशिश करे तो हमारा  देश भी कितना सफल हो जायेगा | क्योंकि  देश के निर्माता  तो  हम खुद ही हैं न!   अतएव  सफलता की कुंजी  वफादारी में छिपी  है | 
                       तो देर किस बात की है अपनी अपनी कुंजी ढूंडने  की कोशिश में लग जाईये अभी. |

                             पाठक  अपने विचार आवश्य  दें ... 
                             ऋतू  राजन  सभरवाल | 

2 comments:

  1. chalo ham bhi aisa hi karte hai kunji dhundhne lagte hai abhi se..acha likha hai

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